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आदमी - आदमी से चाहता क्या है | 'भारत' की नई हिंदी ग़ज़ल

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मानव स्वभाव, अहंकार, टूटने और ज़माने के पाखंड पर आधारित एक मर्मस्पर्शी हिंदी ग़ज़ल... शरीफ़ों की गली में नहीं जाना 'भारत', इस ज़माने में शराफ़त का फ़ायदा क्या है ! आदमी - आदमी से चाहता क्या है,  रंजिशें ग़म से उसे राब्ता क्या है!   ज़हन में जब है इख़्तियार-ए-वफ़ा,   चुनता नफ़रत का रास्ता क्या है!   'हम ही हम हैं' में जब सोच बहकती है,   ख़ाक होना है, फिर ये वास्ता क्या है!   क्यों कत्लेआम मचाते हैं ज़माने में,   ऐसी सनक से दिल का रिश्ता क्या है!   लोग ठुकरा के बिखर जाते हैं पल भर में यहाँ,  दिल के टूटकर बिखरने से भी सस्ता क्या है!   मुहब्बत की बातें जो करते हैं अक्सर यहाँ,  चुभाते हैं जो दिल, वो खंज़र से ज़्यादा क्या है!   'बुरा' कोई कह दे या 'भला' कह दे,   सबको मना लेने का रास्ता क्या है!   क़ायदे-आज़म, सैयाद यहाँ बने फिरते हैं,   उन्हें रोक लेने का आख़िर क़ायदा क्या है!  शरीफ़ों की गली में नहीं जाना 'भारत',   इस ज़माने में शराफ़त का फ़ा...

Kavitaon_ki_yatra:-श्रीरामायणामृतम् भाग-10: तोटक, स्रग्विणी व शिखरिणी छंद में ईश स्तुति

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सज्जनों! आप सभी के स्नेह, दुलार व आशीर्वाद से 'श्रीरामायणामृतम्' की यह काव्य-यात्रा भाग-१ से प्रारम्भ होकर अब भाग-१० के उस पावन सोपान तक पहुँच गई है, जहाँ तोटक, स्रग्विणी एवं शिखरिणी छंदों के दिव्य विधान में श्रीराम बारात के प्रस्थान तथा विवाह मण्डप में चारों भाइयों के अलौकिक विवाह का सजीव वर्णन किया जा रहा है। ​— kavitaon_ki_yatra मंगलाचरण: तोटक छंद में श्री गणेश वंदना ​"विघ्न विनाशक देव गणेश, करो काव्य का मङ्गल प्रवेश" — तोटक छंद में श्री गणेश वंदना | श्रीरामायणामृतम् (भाग-१०) गणनाथ गजानन विघ्नहरा, शिवनंदन मंगल मोदकरा। जय हो जय हो गजवेष धरो, प्रभु आन मिलो मम कष्ट हरो। प्रभु नाम जपूँ तुम छंद वरो, भव सागर से अब पार करो। कवि भारत देवत काव्य हविं, जय हो गणनायक शेष छविं।  काव्य भावार्थ :-  हे समस्त विघ्नों को हरने वाले गजमुखी श्री गणेश! हे गणों के स्वामी और शिव-पुत्र श्री गणेश! आप सभी को परम आनंद प्रदान करने वाले हैं तथा आपने अपने कर-कमलों में मोदक धारण किया हुआ है। हे प्रभु! आप गजवेष धारण कर प्रकट हों और मेरे समस्त कष्टों का निवारण करें। ​मैं सदैव आपके ही पावन नाम का स्...

Kavitaon_ki_yatra: संविधान से सवर्ण व्यथा (दीप छंद में काव्य प्रस्तुति)

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योग्यता की मृत्युशैया और संवैधानिक विसंगति: सत्य शोधन महागाथा "वर्तमान परिस्थितियाँ आज योग्यता को रुग्णावस्था में पहुँचाकर उसे मृत्युशैया की ओर अग्रसर करती प्रतीत हो रही हैं; संभवतः संविधान की विसंगति का चरम यही है। इस मर्मस्पर्शी सत्य को 'दीप छंद' (नसल १११) के कड़े शास्त्रीय अनुशासन में पिरोने का प्रयासों यहाँ क्या गया है, जहाँ प्रत्येक पंक्ति १० मात्राओं के गणितीय सन्तुलन पर आधारित है।                  ----  kavitaon_ki_yatra "भारी आरक्षण और सिसकती योग्यता: जब तराजू ही पक्षपाती हो जाए।" ​  दीप छंद: आरक्षण का भार और योग्यता का सत्य शोधन   चाल बहुत कमाल। सच शोधन सवाल।।   लिख जब संविधान। क्यों नूतन विधान।।   बहुत असम विधान। केवल हि अवमान।।  लिखा हि रक्षित लेख। सवर्ण बिन प्रलेख।।   जब हो सम प्रबोध। काहे फिर विरोध।।   दानव जब हि भाव। पाटत मनुज लाव।।   नारी रक्षण ढाल। बना कहि-कहि काल।।  कानून बन खेल। करता सब विषैल।।    जो नूतन विधान। करे हृदय श्मशान।। कर हृदय वीरान। दनुज बन इंस...