Kavitaon_ki_yatra:-श्रीरामायणामृतम् भाग-10: तोटक, स्रग्विणी व शिखरिणी छंद में ईश स्तुति
सज्जनों! आप सभी के स्नेह, दुलार व आशीर्वाद से 'श्रीरामायणामृतम्' की यह काव्य-यात्रा भाग-१ से प्रारम्भ होकर अब भाग-१० के उस पावन सोपान तक पहुँच गई है, जहाँ तोटक, स्रग्विणी एवं शिखरिणी छंदों के दिव्य विधान में श्रीराम बारात के प्रस्थान तथा विवाह मण्डप में चारों भाइयों के अलौकिक विवाह का सजीव वर्णन किया जा रहा है। — kavitaon_ki_yatra मंगलाचरण: तोटक छंद में श्री गणेश वंदना "विघ्न विनाशक देव गणेश, करो काव्य का मङ्गल प्रवेश" — तोटक छंद में श्री गणेश वंदना | श्रीरामायणामृतम् (भाग-१०) गणनाथ गजानन विघ्नहरा, शिवनंदन मंगल मोदकरा। जय हो जय हो गजवेष धरो, प्रभु आन मिलो मम कष्ट हरो। प्रभु नाम जपूँ तुम छंद वरो, भव सागर से अब पार करो। कवि भारत देवत काव्य हविं, जय हो गणनायक शेष छविं। काव्य भावार्थ :- हे समस्त विघ्नों को हरने वाले गजमुखी श्री गणेश! हे गणों के स्वामी और शिव-पुत्र श्री गणेश! आप सभी को परम आनंद प्रदान करने वाले हैं तथा आपने अपने कर-कमलों में मोदक धारण किया हुआ है। हे प्रभु! आप गजवेष धारण कर प्रकट हों और मेरे समस्त कष्टों का निवारण करें। मैं सदैव आपके ही पावन नाम का स्...