kavitaon_ki_yatra:तपी छंद में युद्ध के अनाथों की करुण प्रार्थना विश्व युद्ध अनाथ दिवस विशेष
विश्व युद्ध अनाथ दिवस के अनाथों की आर्त पुकार तपी छंद में प्रस्तुति
"युद्ध किसी भी परिस्थिति का कोई विकल्प नहीं,इसने जब भी अपना रूप दिखाया है केवल विध्वंश ही विध्वंश किया है। इस युद्ध की विभीषिका और क्या हो सकती है कि इसने सदैव सनाथों को अनाथ बना दिया है।विश्व पटल पर हमारे
प्रगति के निशान यही हैं कि हम आज विश्व युद्ध अनाथ दिवस मना रहे हैं।उसी विभीषिका का दर्शन मैंने तपी छंद में उनकी ईश्वर से करुण प्रार्थना का दर्शन कराने का प्रयत्न किया है।"
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| "युद्ध की विभीषिका में कुचले जाते मासूम प्रसून—एक मर्मस्पर्शी चित्रण" |
'अनाथों की त्राण पुकार'(तपी अष्टपदी)
जान सुनो मत लो। त्राण हमें अब दो।।प्रेम सदा बुनना। वैर नहीं चुनना।।
लील रहे जग को। लूट लिये दृग को।।
क्या इससे मिलता। रौंद प्रसून खिलता।।
— भारत भूषण 'पाठक'
काव्य भावार्थ:-युद्ध की विभीषिका के पश्चात उन सनाथों के ,जो अब इस युद्ध के कारण अनाथ हो चुके उनकी मनोदशा व ईश्वर से प्रार्थना करते हुए युद्ध से भी अनुरोध का दर्शन कराने का प्रयत्न यहाँ किया गया है।
काव्य के प्रथम पंक्ति में युद्ध से प्राण ना लेने और इस युद्ध से उन्हें मुक्त करने की प्रार्थना की गयी है।समस्त जगत में प्रेम को स्थापित करने और वैर को मिटाने की बात इस काव्य को पूर्ण करती-सी प्रतीत होती है।पुनः युद्ध को उसके फलस्वरूप होने वाले नुकसान का दर्शन कराने और मानव को भी यह बताने कि युद्ध द्वारा तुम इस जग को निगले जा रहे हो और इस विनाश के ताण्डव के फलस्वरूप प्रसून यानि बच्चों को,हर खिलखिलाते,मुस्कुराते चेहरे को रौंद देने में तुम्हें क्या आनंद आखिर मिलता है,इस युद्ध के भावपक्ष को और भी मजबूत बनाता है।प्रत्येक पंक्तियों में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग काव्य को जीवंत कर देता है।
काव्य में आए कुछ कठिन शब्दों के अर्थ
| शब्द | अर्थ |
| त्राण | संरक्षण, बचाव या मुक्ति |
| प्रसून | पुष्प, कोमल बालक (यहाँ रूपक के रूप में) |
| विभीषिका | भयानकता, अत्यंत डरावनी स्थिति |
| आर्त | दुखी, पीड़ित, करुणा से भरी पुकार |
| वैर | शत्रुता, दुश्मनी |
| सनाथ | जिसका संरक्षक मौजूद हो (अनाथ का विलोम) |
मात्राभार एवं गण-गणना तालिका
| चरण (पंक्ति) | वर्ण विन्यास | गण विन्यास | कुल वर्ण |
| त्राण हमें अब दो | त्रा ($2$) ण ($1$) ह ($1$) | भगण ($211$) | $3$ |
| में ($2$) अ ($1$) ब ($1$) | भगण ($211$) | $3$ | |
| दो ($2$) | गुरु ($2$) | $1$ | |
| कुल योग | भगण + भगण + ग | $7$ वर्ण |
निष्कर्ष :-युद्ध एक ऐसा विकल्प है जिसके पश्चात कोई प्रकल्प ही नहीं बचता।उसके पश्चात निर्माण का संकल्प लेना भी शिव संकल्प लेने के समान ही होता है,आज तक जितने भी युद्ध लड़े गए,किसी भी युद्ध के फलस्वरूप निर्माण तो नहीं हुआ ,हाँ विध्वंश अवश्य हुआ।शायद इसी युद्ध की विभीषिका को देखकर सम्राट अशोक जो इतिहास में चण्ड अशोक के नाम से भी जाने जाते थे ,इसके पश्चात के दृश्य ने उनका हृदय परिवर्तन कर दिया और उन्होंने बौद्ध धर्म को अपना लिया,बस इसी का दर्शन कराने का प्रयत्न मैंने यहाँ किया है, आप इस सृजन के भाव से कहाँ तक संतुष्ट हैं ।यदि इस सृजन ने आपके अंतस में झाँका है तो आपकी आशीर्वाद स्वरूपी प्रतिक्रिया अवश्य मिले।

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