NEET Paper Leak Kavita: श्रम ही है ईमान हमारा | ताटंक छंद में तीखा व्यंग्य । kavitaon_ki_yatra
संसार में विद्यार्थी नामक जीव एक ऐसा जीव है जो कभी भी संघर्षों से घबराता नहीं है, पर NEET paper leak जैसी समस्या उसके इस उमंग व उत्साह को क्षीण अवश्य कर देती है। उस विद्यार्थी को कैसा अनुभव होता है, ताटंक छंद में हिन्दी कविता के रूप में मेरा प्रयास सादर प्रस्तुत है।
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| महीनों की तपस्या जब चंद रुपयों में बिक जाती है! (NEET पेपर लीक की हताशा को दर्शाता चित्र) |
श्रम ही है ईमान हमारा: NEET Paper Leak पर ताटंक छंद कविताएँ
काव्य भावार्थ :-
प्रस्तुत ताटंक छंद के माध्यम से यह दर्शाने का प्रयास किया गया है कि विद्यार्थी ही वह जीव है, जो किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कठिन से कठिनतम परीक्षाओं और संघर्षों से गुज़रने को सहर्ष तैयार रहता है। "एक गाँव डायन भी छोड़े" पंक्ति के माध्यम से व्यवस्था पर करारा प्रहार करते हुए यह रेखांकित किया गया है कि कम से कम शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र को तो भ्रष्टाचार और धांधली से मुक्त रखा जाना चाहिए था।
कवि ने उन शिक्षा-माफियाओं को आईना दिखाया है कि अपने सपनों को साकार करने के लिए एक विद्यार्थी अपनी अनगिनत खुशियों को न्योछावर कर देता है और न जाने कितनी रातें जागकर बिताता है। बिना मेहनत के लीक पेपर के भरोसे सफलता पाने वाले अभ्यर्थी तो श्रम का मूल ही भूल जाएँगे।
ऐसी अनैतिक राह चुनकर आलसी बनने वाले यह अभ्यर्थी आगे जीवन की कठिन राहों और समस्यारूपी कंटकों का सामना भला कैसे करेंगे? जो उम्र संघर्ष करने, मेहनत का महत्व समझने और खुद को तपाने की थी, उसमें ऐसे गलत रास्तों का सहारा लेकर वे मानसिक रूप से और भी कमज़ोर हो जाएँगे। आज जो पके-पकाए रास्तों रूपी 'फूलों' पर चल रहे हैं, वे कल जीवन के 'शूलों' को कैसे सहेंगे?
ऐसे नाकाबिल अभ्यर्थियों का तंत्र में आना एक भयंकर विडंबना को जन्म देगा। सबसे बड़ा कटाक्ष तो यह है कि जब इन अयोग्य लोगों को उपचार का अवसर मिलेगा, तो अपनी अज्ञानता के कारण कहीं वे उन्हीं शिक्षा-माफियाओं का इलाज करके उन्हें परमधाम न पहुँचा दें!
काव्य में आए कुछ कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| दिवा-रात्रि | दिन और रात |
| होम किया | न्योछावर किया / समर्पित किया |
| पौरुष हीन | पराक्रम या शक्ति से रहित |
| सृजनशील | रचनात्मक / निर्माण करने योग्य |
| कंटक | काँटा / बाधाएँ |
| वंशबेल | पीढ़ी / संतति का क्रम |
| शूल | नुकीला काँटा / कष्ट |
| भार हीन काया | चिंतामुक्त शरीर |
ताटंक छंद मात्राभार विवरण एवं तालिका
ताटंक छंद में प्रति चरण 30 मात्राएँ होती हैं। इसका यति-विधान 16 और 14 मात्राओं (16 + 14 = 30) पर होता है तथा चरणांत दो गुरु (22) वर्णों पर होता है।
| क्र. | काव्य-पंक्ति | प्रथम यति (16) | द्वितीय यति (14) | कुल |
|---|---|---|---|---|
| 1 | श्रम ही है ईमान हमारा, डरते हम करने से क्या? | 16 | 14 | 30 |
| 2 | दिवा-रात्रि सब होम किया है, सुख जीवन के त्यागा है। | 16 | 14 | 30 |
| 3 | आलस को जिसने रोपा है, कंटक उसने ही भोगा। | 16 | 14 | 30 |
| 4 | फूलों पे अभी चलेंगे जो, शूलें क्या सह लेंगे वो। | 16 | 14 | 30 |
| 5 | सोचें रोगी जनाब ही हों, भार हीन होगी काया। | 16 | 14 | 30 |
निष्कर्ष :-
NEET पेपर लीक जैसे गंभीर मामले उन युवाओं के विश्वास को बुरी तरह झकझोर देते हैं, जो केवल कड़ी मेहनत और ईमानदारी को ही अपना धर्म मानते हैं। जब दिन-रात परिश्रम करने वाला एक निष्ठावान अभ्यर्थी यह देखता है कि कोई अनुचित साधनों और लीक पेपर के बल पर आसानी से सफल हो रहा है, तो उसका आत्मविश्वास डगमगाना स्वाभाविक है।
ताटंक छंद में रचित यह कविता इसी कसक और युवाओं की व्यथित मनोदशा को उजागर करती है। साथ ही, यह रचना इस चेतावनी को भी रेखांकित करती है कि ऐसी अनैतिक सफलता पाने वाले अयोग्य अभ्यर्थी भविष्य में समाज और देश के लिए कितने घातक परिणाम प्रस्तुत कर सकते हैं। अंतत:, श्रम और प्रामाणिकता ही विद्या की वास्तविक शक्ति है।
पाठकीय संवाद :-
युवाओं और समाज पर प्रभाव डालते ऐसे ही समकालीन विषयों पर हमारी पुरानी वेबसाइट का यह लेख भी अवश्य पढ़ें: ऑनलाइन गेमिंग के दुष्प्रभाव एवं सामाजिक प्रभावसज्जनों एवं शिक्षाविदों! क्या इस प्रकार के पेपर लीक से विद्यार्थियों का मनोबल टूट नहीं जाएगा? सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि कहीं उनमें यह सोच विकसित न हो जाए कि ऐसे कठिन अध्ययन का क्या लाभ, जब प्रतिफल किसी और को ही मिलना है!
आज के परिवेश में परीक्षार्थियों से अक्सर यह सुनने को मिलता है कि "मेहनत कितनी भी कर लो, लाभुक तो वही होगा जो इस नीलामी में ऊँची बोली लगाएगा।"
जब युवाओं में यह निराशाजनक सोच घर करने लगी है, तो कहीं आगे चलकर यह विचार भी विकसित न हो जाए कि पढ़ने-लिखने का औचित्य ही क्या है! यदि सही योग्यता को उचित परिणाम नहीं मिलेगा, तो इसके परिणाम अत्यंत भयंकर होंगे—कहीं ऐसा न हो कि यह धरा 'सच्चे विद्यार्थी' शब्द से ही विहीन हो जाए!
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