Kavitaon_ki_yatra:मधुमालती छंद में 'महाप्राण निराला' व 'अहिल्याबाई होलकर' यशोगान
महाप्राण निराला और अहिल्याबाई के प्रति तुच्छ भावपुष्प
"आज की इस विशेष प्रस्तुति में लोकमाता अहिल्याबाई होलकर और महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी को मधुमालती छंद के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित करने का एक विनम्र प्रयत्न किया गया है। इन दोनों महान और उदार हृदयों के विराट व्यक्तित्व व कृतित्व के बारे में कुछ भी लिख पाना अत्यंत कठिन है, यह कोई सहज कार्य नहीं। फिर भी, उनकी स्मृतियों को शब्दों में पिरोने का एक छोटा सा दुस्साहस आज किया गया है।"
-- "kavitaon_ki_yatra"
ज्ञानी-गुणी माँ दानिनी। जगती सुता-सुत ध्यायिनी।।"मधुमालती छंद में श्रद्धा-दशक"
सुख भूल अपना तू सदा। खुद शूल सहती सर्वदा।।
मनमस्त हो लिखते सदा। बन नीर ही बहते सदा।।
आदित्य आभा पाठते। मन से सृजन ही वांचते।।
शिव शंभु की वह भक्त थी। जय भी निराला काव्य की।।
काव्य भावार्थ:प्रस्तुत पंक्ति में उस ममतामयी शिवभक्त माता होलकर को ज्ञानी-गुणी और सर्वश्रेष्ठ दानी बताया गया है,जिसे सम्पूर्ण समष्टि(संसार) के सुत(पुत्र,बेटा) और सुता(पुत्री,बेटी) के सुख-दुख की सदैव चिन्ता रहती थी।
काव्य में भावपक्ष को मजबूत करने के लिए यह बतलाया गया है कि अपने सुखों को भूल माता होलकर,खुद जीवन के कठिनाई स्वरूपी शूल को सह लेती थी।
कविता के आगे की पंक्ति में निराला जी के अल्हड़पन,फक्कड़पन,मनमस्त मिजाज़ी भाव को दिखाने के साथ उनकी "तुलना उस जलबूँद से -की गयी है,जो बिना किसी भेदभाव के अनवरत बहता हो,यही उनकी काव्य की भी विशेषता रही है। उनके नाम को परिभाषित करने का तुच्छ प्रयत्न करते हुए यह बतलाया गया है कि जो आदित्य आभा समाहित हैं,वे मन से ही कुछ लिखा करते थे,मतलब
मोभाव अनुकूल ही उनकी रचना होती थी।
पुनः काव्य के अंतिम पंक्ति में माता अहिल्याबाई होलकर
को एक शिवभक्त बताते हुए निराला जी के अनमोल कृतियों की जय गान की गयी है।
काव्य में आए कुछ कठिन शब्दार्थ व मात्राभार गणना तालिका
| शब्द / घटक | अर्थ | मात्रा गणना (math) | कुल मात्रा |
| अहिल्याबाई | लोकमाता, इंदौर की शासिका | १+१+१+१+२+१ | ७ |
| महाप्राण | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी | १+२+२+१+१ | ७ |
| यशोगान | कीर्ति का गान / प्रशंसा | १+२+२+१ | ६ |
| मधुमालती | एक विशिष्ट मात्रिक छंद | १+१+२+१+२ | ७ |
| श्रद्धा-दशक | दस पंक्तियों की काव्यांजलि | २+२+१ + १+१+१ | ९ |
विशेष संदर्भ: लोकमाता अहिल्याबाई होलकर ने काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया और महाप्राण निराला जी ने हिंदी कविता में 'मुक्त छंद' का मार्ग प्रशस्त किया। इन्ही दो महान चेतनाओं को यह तुच्छ काव्यांजलि समर्पित है।
इन्हें भी अवश्य पढ़ें (छंद विशेष):
निष्कर्ष:-अहिल्याबाई होलकर और महाप्राण निराला ने अपने-अपने क्षेत्र में इस समष्टि के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।
जहाँ माता होलकर ने काशी विश्वनाथ मंदिर निर्माण और गरीब निराश्रितों के लिए अपना संपूर्ण कोष न्योच्छावर कर दिया,वहीं महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी'निराला' जी ने अपने काव्य की अजस्र धार से इस समष्टि का अपने मनमस्त अंदाज में कल्याण उसे अपनी कृतियों के माध्यम से प्रेरणा देकर किया।आपको यह पोस्ट कितनी पसंद आई टिप्पणी पेटिका में आशीर्वाद स्वरूपी अपनी प्रतिक्रियाओं द्वारा अवश्य बताएँ ।
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कुछ महत्वपूर्ण छ़ंदाधारित प्रश्न व उसके उत्तर
१.शैल सुता सवैया छंद की गणावली बताएँ?उत्तर-शैल सुता सवैया छंद की गणावली :-नसल जभान जभान जभान जभान जभान जभान ल गा है।२.शैल सुता सवैया छंद किस प्रकार का छंद है ?उत्तर-यह एक प्रकार का वार्णिक छंद है।३.सार छंद का विधान बताएँ?उत्तर- सार छंद मे़ं कुल २८ मात्रा होती है, जिसमें यति विभाजन १६-१२ मात्रा पर यति होती है। इसके अंत में वाचिक भार २२ होता है।४.अनवसिता छंद का विधान बताएँ?उत्तर-यह एक वार्णिक छंद है जिसका विधान नगण यगण भगण गुरु गुरु, यति ६,५=११ वर्ण प्रति चरण, दो-दो चरण तुकांत लेखन विधि।५.अनवसिता छंद की गणावली क्या है?उत्तर-इसकी गणावली नसल यमाता भानस गा गा है।६.चंद्रिकात्मजाया किस प्रकार का छंद है तथा इसकी मापनी क्या है?उत्तर-यह एक वार्णिक छंद है, जिसकी मापनी १११ १११ २११ २११ २ है।७.चंद्रिकात्मजाया छंद के लक्षण क्या हैं?उत्तर- इसके लक्षण नभयुगलित चंद्रित आत्मनि गा है़ं।
८.निराला जी को महाप्राण क्यों कहा गया है?
उत्तर-स्वयं लिखें।
उत्तर-स्वयं लिखें।
९.विश्वनाथ मंदिर का निर्माण किसने कराया?
उत्तर-इस मंदिर का निर्माण अहिल्याबाई होलकर ने कराया था।
१०.मधुमालती छंद के लक्षण क्या हैं ?
उत्तर-इस मंदिर का निर्माण अहिल्याबाई होलकर ने कराया था।
१०.मधुमालती छंद के लक्षण क्या हैं ?
उत्तर-मधुमालती छंद के लक्षण हैं:
- कुल मात्राएँ: इस छंद के प्रत्येक चरण में कुल १४ मात्राएँ होती हैं।
- यति (विराम): इसमें ७, ७ मात्राओं पर यति (विराम) अनिवार्य है।
- मापनी (Pattern): इसकी निश्चित मापनी २२१२ २२१२ होती है।
- अनिवार्यता: चरण के अंत में २१२ (राजभा - गुरु-लघु-गुरु) आना अनिवार्य है, जो इसे इसकी विशिष्ट लय और सुंदरता प्रदान करता है।

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