जीवन मथनी बीच में पिसता है संसार..



दोहा छंद एक अर्धसममात्रिक छंद है जो चार चरणों में पूर्ण होता है,यानि यहाँ हम ऐसा कह सकते हैं कि केवल चार चरणों में इस छंद में गूढ़ से गूढ़तम बात कही जा सकती है।
इस छंद की लयबद्धता के लिए कल संयोजन का ध्यान रखना अनिवार्य होता है।

सुन्दरतम कल संयोजन से यह सरस ,सुमधुर व मनोहारी बन जाती है 13-11 के इस विधान में कल संयोजन का ध्यान रखकर छंद विद्यार्थी इस सुन्दरतम छंद का अभ्यास कर सकते हैं।

दोहे का प्रथम व तृतीय चरण विषम तथा द्वितीय व चतुर्थ चरण क्रमशः सम चरण कहलाता है।

विषम चरणों की ग्यारहवीं मात्रा लघु होने से दोहे में सरसता लक्षित होती है।

कल संयोजन से हमारा तात्पर्य मात्राओं का सुन्दरतम विभाजन से है:-

कल परिचय-




कलों के कुल तीन प्रकार हैं-

1- द्विकल, 2- त्रिकल, 3- चौकल




1- द्विकल -

दो मत्राओं से बने शब्द या शब्द भाग को द्विकल कहते हैं।

जैसे- अब, जब, की, पी, सी आदि।

द्विकल= 1+1=2 मात्रा




2- त्रिकल-

तीन मात्राओ के शब्द या शब्द भाग से मिलकर बने शब्द त्रिकल कहलाते हैं.

जैसे- राम, काम, तथा, गया हुई आदि।




त्रिकल= 1+1+1

= 1+2

= 2+1



प्रत्येक योग= कुल 3 मात्रा




3- चौकल-

इसी परकार चार मात्राओ के शब्द या सब्द भाग कोे चौकल कहते है।

जैसे- अजगर, अजीत, असगर, रदीफ,




चौकल =1+1+1+1

=1+1+2

=2+1+1

=1+2+1

=2+2

प्रत्येक योग =4 मात्रा

दोहे में कल संयोजन-




पहले चरण व तीसरे चरण में

कल संयोजन इस क्रम में होता है....

= 4+4+3+2 =13 मात्रा

या

=3+3+2+3+2=13 मात्रा




द्वितीय चरण व चौथे चरण में

कल लंयोजन इस क्रम में होता है...

= 4+4+3=11 मात्रा

या

=3+3+2+3=11 मात्रा


छंद विधान के आधार पर प्रयास सादर समर्पित है:-


Jeevan mathni beech main pista hai sansaar
Shriramayanaamritam


मथनी जीवन की चले, देखो कैसे यार।
कहीं सुहानी धूप तो,ठंडी कहीं बयार।।१
मानव पिसता जा रहा,गेहूँ बन तैयार।
तेज धार कटार नहीं,मृदु बोली हथियार।।२
तिनका-तिनका जोड़कर,विहग बनाते नीड़।
मानव पर देखो यहाँ,गृह तोड़े बन भीड़।।३
सीखें खग से हम सभी,सबसे करना प्रीत।
वैर भाव हम दें मिटा,अपना यह सुन्दर रीत।।४

मन को कलुषित दें खिला,भूलें बीती बात।
स्वागत नए प्रभात का,विस्मित कर अब रात।।५
सब कुछ संभव हो यहाँ,यत्न करो पुरज़ोर।
सफल यहाँ पर है वही,श्रम करे बिना शोर।।६
भारत भूषण पाठक'देवांश'🙏🌹🙏
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