उमंगों भरा ही अभी साल हो
गीत छंदों पर आधारित एक प्यारी विधा है।गीत का शाब्दिक अर्थ है गाने वाली।इस "गीत शब्द " में समाहित अर्थ है गाने के पश्चात मन तार को झंकृत करनेवाली।गीत के विधान को यदि समझा जाय तो गीत छंदों पर आधारित वो विधा है जिसमें गेयता का होना अनिवार्य है,लयबद्धता होना अनिवार्य है।ये छंद मात्रिक या वार्णिक कोई भी हो सकते हैं।सामान्यतः हमने लोकगीतों के बारे में सुना है।लोकगीत अर्थात् क्षेत्र विशेष में प्रचलित भाषा के आधार पर प्रचलित गीत।गीत पारंपरिक व फिल्मी गीत हो सकते हैं।
विधान-गीत के मुख्यतः दो भाग होते हैं:-मुखड़ा और अंतरा।मुखड़ा एक, दो तीन या चार पंक्तियों का होता है।मुखड़े की एक पंक्ति टेक(ठहराव)के रूप में प्रयुक्त होती है जो अंतरे की अंतिम पंक्ति के साथ मिलकर मुखड़े से जोड़ देती है।प्रायः यह टेक मुखड़े की पहली या अंतिम पंक्ति होती है।
अंतरा तीन या उससे अधिक पंक्तियों का छंद होता है।यह छंद स्वैच्छिक होता है यानी गायक के द्वारा स्वयं ग्रहण किया हुआ।गीत के मुखड़े या छंद समान हों ये आवश्यक नहीं।
अलग- अलग पंक्तियों के आधार छंद अलग अलग हो सकते हैं पर लय के अनुसार उनका मिलान आवश्यक है। पंक्तियों की तुकांतता या अतुकांतता गीतकार की इच्छा पर निर्भर होती है लेकिन इसका हर अंतरे में एकसमान होना आवश्यक है। एक गीत में दो या इससे अधिक अंतरे होते हैं तथा एक अंतरे में दो या अधिक पंक्तियां होती हैं।
गीत की भावभूमि हर जगह एकसमान होती है। मुखड़े में गीत का विषय वस्तु होता है जो श्रोता के मन में गीत सुनने की जिज्ञासा पैदा करता है और अंतरे में भावों का विस्तृत प्रदर्शन होता है। अंतरे की संरचना अन्य मुक्तकों की तरह ही होता है यानी प्रथम पंक्ति में विषय का संधान होता है और पूरक पंक्ति के प्रहार में श्रोता को रसमुग्ध करने की क्षमता होनी चाहिए।
पूरक पंक्ति यानी अंतरे की अंतिम पंक्ति और "टेक" एक दूसरे की पूरक होती है। तुकांतता और लय विधान सभी अंतरा में एकसमान होना चाहिए। मुखड़े का लय समान भी हो सकता है और असमान भी, किन्तु "गेयता" किसी भी सूरत में बाधित नहीं होनी चाहिए।
उत्तर-दोही दोहे का ही एक प्रकार है। इसके विषम चरणों में १५-१५ एवं सम चरणों में ११-११ मात्राऐं होती हैं।
५.त्रिभंगी छंद का विधान क्या है?
उत्तर-चार पद, प्रत्येक पद में चार चरण और ३२ मात्रा,१०/८/८/6, पदांत दीर्घ। इस छंद का प्रत्येक पद तीन बार भंग होता है, इसलिए इसे त्रिभंगी छंद कहते हैं।
६.हिंदी में पहली प्रकाशित किताब कौन सी थी?
उत्तर-हिंदी साहित्य की पहली कहानी का नाम "रानी केतकी की कहानी" है। यह कहानी सैयद इंशाअल्ला खाँ ने 1803 या 1808 में लिखी थी। यह कहानी मध्यकालीन भारत की एक प्रेम कहानी है। कहानी में रानी केतकी और राजकुमार वीरसेन की प्रेम कहानी को बताया गया है। साहित्य की पहली कहानी का नाम "रानी केतकी की कहानी" है।
७.छंद शास्त्र की प्रथम पुस्तक कौन सी थी?
उत्तर-पिंगल का छन्दः सूत्र वैदिक और लौकिक दोनों प्रकार के छन्दों का प्रामाणिक ग्रंथ है। इसकी भाषा सूत्रात्मक होने से कठिन है । इस पर टीकाएँ तथा व्याख्याएँ हो चुकी हैं। यही छन्दशास्त्र का सर्वप्रथम ग्रन्थ माना जाता है। इसका छन्दः सूत्र वैदिक और लौकिक दोनों प्रकार के छन्दों का प्रामाणिक ग्रंथ है।
८. छंद के जनक कौन थे?
उत्तर-पिंगल रचित 'छन्दसूत्र' ऐसा ग्रन्थ है जिसमें वैदिक एवं लौकिक दोनों प्रकार के छन्दों का व्यवस्थित वर्णन प्राप्त होता है । यही कारण है कि पिंगल को छन्द का प्रवर्तक एवं उन छन्दसूत्र को छन्द -परम्परा का आदि ग्रन्थ माना जाता।
९.गीतिका और हरिगीतिका छंद में क्या अंतर है?
उत्तर-गीतिका छंद में एक गुरु बढ़ा देने से इसका वर्ण विन्यास निम्न प्रकार होता है। चूँकि हरिगीतिका छंद एक मात्रिक छंद है अतः गुरु को आवश्यकतानुसार २ लघु किया जा सकता है परंतु ५वीं, १२ वीं, १९ वींं, २६ वींं मात्रा सदैव लघु होगी।
अंत सदैव गुरु वर्ण से होता है। इसे २ लघु नहीं किया जा सकता।
१०.हरिगीतिका छंद किसे कहते हैं ?
हरिगीतिका चार चरणों वाला एक सम मात्रिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 16 व 12 के विराम से 28 मात्रायें होती हैं तथा अंत में लघु गुरु आना अनिवार्य है। हरिगीतिका में 16 और 12 मात्राओं पर यति होती है। प्रत्येक चरण के अन्त में रगण आना आवश्यक है।
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